Monday, November 14, 2016

'मैं' कौन है?

यह क्या 'मैं-मैं' लगा रखा है आपने सरकार? 'मैंने ये किया, मैंने वो किया, मैं ये नहीं करने दूंगा, मैं वो नहीं होने दूंगा'! कहीं आप भूल तो नहीं रहे कि आप एक गणतंत्र के चुने हुए सरकार के मंत्रिमंडल के प्रधान हैं, देश के प्रधानमंत्री हैं, कोई तानाशाह नहीं?

सनद रहे कि लोकतंत्र में सरकारी निर्णय मंत्रीमंडल की सामूहिक ज़िम्मेदारी (Collective Responsibility of the Cabinet) के तहत लिए जाते हैं। आपकी कोई सरकार है भी या नहीं? या आप खुद ही पूरे के पूरे सरकार हैं? आपके मंत्रीमंडल का कोई वजूद है भी, या कुछ पुतलों को बिठा कर खानापूर्ति की जा रही है? न, न! बुरा मत मानिए। आपके इस 'मैं-मैं' की वजह से इस प्रकार के प्रश्न तो उठेंगे ही माननीय प्रधानमंत्री महोदय!

साहब, जिन लोगों ने आपको प्रधानमंत्री चुना है, उनका कुछ सम्मान तो बनता है! लीजिये, आज फिर एक निःशुल्क सलाह देता हूँ (देश का नागरिक हूँ, इतना हक़ तो है ही)। 'मैं' के स्थान पर 'हम' और 'हमारी सरकार' जैसे शब्दों का प्रयोग करना शुरू कीजिए। जो अच्छा काम आपने किया है, उसका कुछ श्रेय अपने साथियों को भी दीजिये। विश्वास करें, अगर आप ऐसा करते हैं तो जनता की आँखों में आपका प्रभाव कम नहीं होगा, बल्कि सम्मान बढ़ेगा ही।

वैसे यह बीमारी आपके विरोधियों को भी है, पर आपको इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि एक तो प्रधानमंत्री होने के नाते आपका उत्तरदायित्व कुछ अधिक है, और दूसरा यह कि आपसे कुछ उम्मीदें हैं, उन से कुछ नहीं। उनको कह कर भी क्या होगा! आपको तो अपना समझ कर कुछ कह दिया, अब आशा करता हूँ आप भी अपना समझ कर मनन करेंगे..

सादर,
आपका अपना,
मैंगो मैन

Monday, November 7, 2016

इंसान कभी नहीं मरता


जब फिलिस्तीन, यमन तथा वियतनाम जैसे देशों में/पर अन्याय, अतिचार और दमन किए जाते हैं तो हमारे देश से क्रांति, विद्रोह और विरोध की लहरें उमड़ पड़ती हैं। ऐसा होना भी चाहिए, बिलकुल होना चाहिए क्योंकि यही हमारे नैतिक जीवंतता का द्योतक है। पर जब यही अन्याय, अतिचार और दमन की घटनाएं बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में होती हैं, तो ऐसी स्थिति में हमारी प्रतिक्रिया क्या या कैसी होनी चाहिए इस बारे में शायद मरकस बाबा ने कुछ कहा नहीं है। अगर कहा भी हो तो शायद वह बातें हमारे 'सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक रिपब्लिक' के 'प्रगतिवादी बुद्धिजीवियों' पर लागू नहीं होती।

विशुद्ध भारतीय परिप्रेक्ष्य में 'रिलिजन इज़ द ओपियम ऑफ़ द मासेज़' का सरलतम अनुवाद शायद यही है कि 'सनातन हिन्दू धर्म जनगण की अफ़ीम है' या फिर 'इस्लाम विश्व का सबसे बड़ा खतरा है'। बाकी सब अमृत है, पीते रहो और मस्त जीते रहो।

ना, ना! नाराज़ मत होइए मित्रों, चिंतन कीजिये। मैं आपका शुभचिंतक ही हूँ। आप दुनिया का भला चाहते हैं, मैं आपका भला चाहता हूँ। ज़ख़्म दिया है तो कभी मलहम भी लगाऊंगा। उस दिन मुझपर पत्थर दूसरी ओर से पड़ेंगे। यकीन मानिए, मैं भी आप में से ही एक हूँ। सच!

मगर करूं क्या कामरेड्स, दिखता है तो कहना पड़ता है। मस्जिद और मंदिर तोड़ने वालों की कमी नहीं, जोड़ने वाले कहीं नहीं। इंसान कभी नहीं मरता, बस हिन्दू, मुसलमान, सिख और ईसाई मरते हैं; दलित और सवर्ण मरते हैं, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक मरते हैं, बुर्जुआ और प्रोलितारिएत मरते हैं। नेता मरते हैं और साली जनता मरती है! जी हाँ, बस इंसान कभी नहीं मरता। ये अलग बात है कि इंसानियत रोज़ मरती है। हाऊ ब्लडी बोरिंग!!