जब फिलिस्तीन, यमन तथा वियतनाम जैसे देशों में/पर अन्याय, अतिचार और दमन किए जाते हैं तो हमारे देश से क्रांति, विद्रोह और विरोध की लहरें उमड़ पड़ती हैं। ऐसा होना भी चाहिए, बिलकुल होना चाहिए क्योंकि यही हमारे नैतिक जीवंतता का द्योतक है। पर जब यही अन्याय, अतिचार और दमन की घटनाएं बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में होती हैं, तो ऐसी स्थिति में हमारी प्रतिक्रिया क्या या कैसी होनी चाहिए इस बारे में शायद मरकस बाबा ने कुछ कहा नहीं है। अगर कहा भी हो तो शायद वह बातें हमारे 'सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक रिपब्लिक' के 'प्रगतिवादी बुद्धिजीवियों' पर लागू नहीं होती।
विशुद्ध भारतीय परिप्रेक्ष्य में 'रिलिजन इज़ द ओपियम ऑफ़ द मासेज़' का सरलतम अनुवाद शायद यही है कि 'सनातन हिन्दू धर्म जनगण की अफ़ीम है' या फिर 'इस्लाम विश्व का सबसे बड़ा खतरा है'। बाकी सब अमृत है, पीते रहो और मस्त जीते रहो।
ना, ना! नाराज़ मत होइए मित्रों, चिंतन कीजिये। मैं आपका शुभचिंतक ही हूँ। आप दुनिया का भला चाहते हैं, मैं आपका भला चाहता हूँ। ज़ख़्म दिया है तो कभी मलहम भी लगाऊंगा। उस दिन मुझपर पत्थर दूसरी ओर से पड़ेंगे। यकीन मानिए, मैं भी आप में से ही एक हूँ। सच!
मगर करूं क्या कामरेड्स, दिखता है तो कहना पड़ता है। मस्जिद और मंदिर तोड़ने वालों की कमी नहीं, जोड़ने वाले कहीं नहीं। इंसान कभी नहीं मरता, बस हिन्दू, मुसलमान, सिख और ईसाई मरते हैं; दलित और सवर्ण मरते हैं, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक मरते हैं, बुर्जुआ और प्रोलितारिएत मरते हैं। नेता मरते हैं और साली जनता मरती है! जी हाँ, बस इंसान कभी नहीं मरता। ये अलग बात है कि इंसानियत रोज़ मरती है। हाऊ ब्लडी बोरिंग!!
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